Thursday, March 3, 2011

नसीब


हम  सभी  लगता  है 
जैसे  खड़े  हैं  एक  ही  जगह  पर 
किसी  पेड़  की  तरह 
पर  हमारी  हदें  इच्छाएं  फैलती  हैं 
तनों  की  तरह 

हम  जीना  चाहतें  हैं 
अपनी  तरह  से 
चाहते  हैं  मंजिलें  खुद  की  हों  और  
रास्ते  भी  खुद  बनायें 
हो  न  हो  कोई  साथ  पर 
कामयाबी  ढूंढ  लायें 
बेमतलब  भागें  कभी  कभी  की  शायद 
कुछ  मिल  जाए 

पर  कहाँ  होता  है  यह  सब 
अपनी  तरह  से  जीने  की  जिद  बस  पागलपन  है 
उम्र  भर  जलाती रहे 
ऐसी  जलन  है 

असल  में  हम  सभी  जिंदा  हैं 
औरों  के  नसीब  पर 
जैसे  पेड़   जिंदा   है  अपनी  ज़मीन  पर 

उलझन


क्यूं  है  तमाम  रिश्तों  में  उलझी  सी  ज़िन्दगी  
जलते  हुए  जज़्बात  हैं  बुझती  सी  ज़िन्दगी 

लगती  थी  बहुत  पास  मगर  दूर  ही  रही 
है  रेत  के  आईने  में  पानी  सी  ज़िन्दगी 

उठ  गए  कदम  जहाँ  भी  रास्ता  मिला 
दरिया  में  ये  लहरों  की  रवानी  सी  ज़िन्दगी 

जाने  कब  हाथों  से  उम्र  छूट  जायेगी 
है  पेड़   के  पत्तों  की   जवानी  सी  ज़िन्दगी