Thursday, August 27, 2009

संबंध सत्य


जाने क्यूं अब सारे रिश्ते
लेनदेन वाले लगते हैं
लगता है बस सारे रिश्ते
लेन देन तक ही चलते हैं
जब तक मैं देने लायक था
मेरे घर की चौखट पर भी
लोगों के मेले लगते थे
अपने भी वो दुखडा रोते
हालचाल मेरे सुनते थे
आज उसी चौखट पर तनहा
तनहा बैठा सोच रहा हूँ
सारे रिश्ते टूट गए क्यूं
मेले वाले मेरे साथी
जाने मुझसे रूठ गए क्यूं
शायद इसकी एक वजह है
मेरा खाली खाली दामन
फिर भी मैं उनसे कहता हूँ
जब भी तुमको कुछ लेने हो
पास मेरे फिर से आ जाना
हल पूछने मुझसे मेरे
और अपने भी हाल सुनना
फिर से हम सब अजनबियों से
रिश्ते वाले बन जायेंगे
फिर से घर की चौखट पर
कुछ लोगों के मेले से लगेंगे
मीठी मीठी बातों के कुछ जाले
फिर से लोग बुनेंगे
पर मुझे ख़बर है वो रिश्ते भी
बस तब तक ही चल पायेंगे
जब तक कुछ मेरे दामन मैं ऐसा होगा
जो मैं उनको दे सकता हूँ

मौन की वाचालता



आज न कोई बात है करनी
कथा कोई न कविता कहनी
आज मौन रहना है मुझको
पीर कोई चुप रह कर सहनी
शब्द खड़े सम्मुख कर बांधे
कहते हमको फिर से चुन लो
बिखर गयीं जो जीवन कड़ियाँ
उन कड़ियों को फिर से बुन लो
पर शब्दों से बनती बातें
जीवन तो बनता अनुभव से
और अनुभव इतना कड़वा है
जैसे जहर कोई पीना है
कंठ रुका है मेरा ऐसे
जैसे जंजीरें हों पहनी
आज मौन रहना है मुझको
पीर कोई चुप रह कर सहनी

Monday, August 24, 2009

एकाकी की प्रार्थना



क्या हुआ जो फिर समूहों मैं अकेला रह गया मैं
क्या हुआ जो आज फिर से अश्रुओं संग बह गया मैं
क्या हुआ संसार मुझको फिर अकेला छोड़ आया
क्या हुआ जो फिर अमा बन घेरती है कष्ट छाया
बस मेरी इक प्रार्थना स्वीकार तू कर ले इसे
संसार तू मेरे लिए अपने कदम मत रोकना
अपने ह्रदय के द्वार फिर मेरे लिए मत खोलना
शून्य मैं जो खो सके हाँ मैं नहीं हूँ वो कथा
मेरा ह्रदय न सह सके ऐसी नहीं मेरी व्यथा
आज जो मृत प्राय: से हैं स्वप्ना मेरे कल उठेंगे
नयन की चिंगारियों से बुझते दीपक जल उठेंगे
पर मेरी यह प्रार्थना प्रार्थना स्वीकार तू कर ले इसे
संसार तू मेरे लिए अपने कदम मत रोकना
अपने ह्रदय के द्वार फिर मेरे लिए मत खोलना

Thursday, August 20, 2009

सारी दुनिया जब बेगानी बन जाती है;
दीवारों मैं भी इक दुनिया बन जाती है/
कभी कभी बस इंतज़ार हाथों लगता है;
रास्ता देखे सारी उम्र गुज़र जाती है/

Wednesday, August 19, 2009

अंतर्द्वंद

दूर तक फैला तिमिर क्या सत्य है;
या की फैला है मेरे मन का अँधेरा
या की फिर अपने ही अंतर्द्वंद से होकर पराजित
अपने ही अन्तर को मैं कर के विभाजित
इस तिमिर की गोद मैं हूँ आ छिपा