आज न कोई बात है करनी
कथा कोई न कविता कहनी
आज मौन रहना है मुझको
पीर कोई चुप रह कर सहनी
शब्द खड़े सम्मुख कर बांधे
कहते हमको फिर से चुन लो
बिखर गयीं जो जीवन कड़ियाँ
उन कड़ियों को फिर से बुन लो
पर शब्दों से बनती बातें
जीवन तो बनता अनुभव से
और अनुभव इतना कड़वा है
जैसे जहर कोई पीना है
कंठ रुका है मेरा ऐसे
जैसे जंजीरें हों पहनी
आज मौन रहना है मुझको
पीर कोई चुप रह कर सहनी
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