क्यूं है तमाम रिश्तों में उलझी सी ज़िन्दगी
जलते हुए जज़्बात हैं बुझती सी ज़िन्दगी
लगती थी बहुत पास मगर दूर ही रही
है रेत के आईने में पानी सी ज़िन्दगी
उठ गए कदम जहाँ भी रास्ता मिला
दरिया में ये लहरों की रवानी सी ज़िन्दगी
जाने कब हाथों से उम्र छूट जायेगी
है पेड़ के पत्तों की जवानी सी ज़िन्दगी
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