दूर तक फैला तिमिर क्या सत्य है;
या की फैला है मेरे मन का अँधेरा
या की फिर अपने ही अंतर्द्वंद से होकर पराजित
अपने ही अन्तर को मैं कर के विभाजित
इस तिमिर की गोद मैं हूँ आ छिपा
या की फैला है मेरे मन का अँधेरा
या की फिर अपने ही अंतर्द्वंद से होकर पराजित
अपने ही अन्तर को मैं कर के विभाजित
इस तिमिर की गोद मैं हूँ आ छिपा
kya likha hai bhai...wah..
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