अकेले सारी दुनिया से लड़ने निकल पड़े
जाने किस जूनून में शोलों पे चल पड़े।
मंजिल का नशा; ख्वाबों की आदत सी हो गयी
कांटे जो चुभे पाँव में तो फूल से लगे।
है इल्म की स्याही; हौसले की कलम है
लिखने हैं अभी हमको कुछ किस्से बड़े बड़े।
मंजिल पे पहुंचना है तो चलना है ज़रूरी
मंजिल नहीं मिलती कभी यूं ही खड़े खड़े।
-शिव
No comments:
Post a Comment