Monday, August 5, 2013

माँ का वो बहलाना मुझको याद यूं ही आ जाता है
थाली के पानी में भी जब भी चाँद नज़र आ जाता है।

ये जो मेरे खेल खिलौने ख़ामोशी से बैठे हैं
अपना सारा बचपन मुझको इनमें नज़र आ जाता है।

राजा और रानी का किस्सा लगता था बस किस्सा है
लेकिन अब भी कोई किस्सा सुनने में आ जाता है।

आज समझ में आया मुझको देख के घर की दीवारें
अच्छा ख़ासा घर भी यारो खंडहर क्यूं बन जाता है।
-शिव

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