Monday, August 5, 2013

ना जंग चाहिए ना ज़ोरो-ज़बर
मुहब्बत बादशाहत नहीं होती

मुहब्बत नूर है ख़ुदा का, मुहब्बत जश्ने-ख़ुदा
ये पैग़ाम है अल्लाह का, फकीरों की दुआ

मुहब्बत वक्त की पेशानी पर, 
कभी शीरीं लिखे और कभी फरहाद लिखे
कभी ज़ख्मों का मरहम भी बने
कभी नफरतों के जवाब लिखे

कभी डूब जाए बहते धारों में
दफ्न हो जाए है दीवारों में
और मुहब्बत कभी ख़ुद को ज़िदाबाद लिखे

ये होती है; हो के मिटती है
और फिर होती है मिटने के लिए
ये मुहब्बत है मुहब्बत ज़नाब
इसमें कोई अदावत नहीं होती

कैसे ख़रीदोगे मुहब्बत को चाँदी सोने से
ये सारी कायनात है, मुहब्बत ही के होने से
ये मुहब्बत है इसमें तिजारत नहीं होती

ना जंग चाहिए ना ज़ोरो-ज़बर
मुहब्बत बादशाहत नहीं होती

-शिव

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